1990 का चुनाव: जब मध्यप्रदेश में बदलने लगी थी सत्ता की हवा, कांग्रेस के किले में दरार और भाजपा के कमल की दस्तक

1990 का चुनाव: जब मध्यप्रदेश में बदलने लगी थी सत्ता की हवा, कांग्रेस के किले में दरार और भाजपा के कमल की दस्तक

भोपाल। फरवरी 1990 का मध्यप्रदेश… चुनावी मौसम था। शहरों की सड़कों से लेकर गांवों की चौपालों तक एक ही सवाल घूम रहा था—क्या कांग्रेस एक बार फिर सत्ता में लौटेगी या विपक्ष में खड़ी भाजपा इस बार कोई बड़ा उलटफेर करने जा रही है?

यह वह दौर था जब मध्यप्रदेश की राजनीति आज की तरह सीधे दो खेमों में बंटी हुई दिखाई नहीं देती थी। कांग्रेस के भीतर कई बड़े चेहरे थे, अपनी-अपनी राजनीतिक ताकत थी और दिल्ली तक उनकी पहुंच थी। दूसरी तरफ भाजपा अभी उस ऊंचाई पर नहीं पहुंची थी, जहां वह आने वाले वर्षों में दिखाई देने वाली थी। लेकिन संगठन जमीन पर लगातार फैल रहा था।

और फिर चुनाव आया।

नतीजों ने मध्यप्रदेश की राजनीति की पुरानी तस्वीर ही बदल दी।

लेकिन उस नतीजे तक पहुंचने की कहानी सिर्फ मतदान के दिन से शुरू नहीं हुई थी।

कहानी शुरू होती है कांग्रेस के भीतर से…

1985 में कांग्रेस ने मध्यप्रदेश में ऐसी जीत हासिल की थी, जिसने विपक्ष को लगभग हाशिये पर पहुंचा दिया था। विधानसभा की 320 सीटों में कांग्रेस के खाते में 250 सीटें आई थीं।

भाजपा के पास सिर्फ 58 सीटें थीं।

उस समय शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि सिर्फ पांच साल बाद यही आंकड़े लगभग उलट जाएंगे।

लेकिन 1985 के बाद कांग्रेस के भीतर सब कुछ वैसा नहीं रहा।

मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहले मोतीलाल वोरा आए, फिर अर्जुन सिंह और बाद में श्यामाचरण शुक्ल। सत्ता कांग्रेस के पास थी, लेकिन पार्टी के भीतर नेतृत्व और गुटों की खींचतान भी दिखाई देने लगी थी।

अर्जुन सिंह का दौर विशेष रूप से विवादों से घिरा रहा।

माधवराव सिंधिया और मोतीलाल वोरा जैसे कांग्रेस के बड़े नेताओं के साथ उनके मतभेद सार्वजनिक चर्चा का विषय बनने लगे थे। 1989 की शुरुआत में India Today ने कांग्रेस के अंदर अर्जुन सिंह के खिलाफ बढ़ते दबाव और सिंधिया-वोरा खेमे की सक्रियता को विस्तार से रिपोर्ट किया था।

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी समस्या यही थी—बाहर भाजपा से मुकाबला और भीतर नेतृत्व की लड़ाई।

चुरहट की लॉटरी और मुख्यमंत्री की कुर्सी

इसी बीच एक मामला ऐसा आया जिसने मध्यप्रदेश की राजनीति को हिला दिया—चुरहट चिल्ड्रन वेलफेयर सोसायटी की लॉटरी।

भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश जोशी ने 1987 में इस मामले को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। लॉटरी के संचालन और पुरस्कार राशि को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए। मामले में अर्जुन सिंह के परिवार से जुड़े लोगों की सोसायटी में भूमिका भी राजनीतिक विवाद का बड़ा हिस्सा बनी। अर्जुन सिंह ने आरोपों को खारिज किया था।

मामला अदालत तक पहुंचा और जनवरी 1989 में हाईकोर्ट के फैसले के बाद अर्जुन सिंह को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा।

अब कांग्रेस की मुश्किल सिर्फ विपक्ष की आलोचना नहीं थी।

मुख्यमंत्री कौन होगा—यह सवाल भी कांग्रेस के भीतर संघर्ष बन चुका था।

भोपाल में विधायक दल की बैठकों, दिल्ली से आने वाले पर्यवेक्षकों और अलग-अलग गुटों की ताकत का हिसाब लगने लगा। उस समय की रिपोर्टों में अर्जुन सिंह, माधवराव सिंधिया, मोतीलाल वोरा और अन्य नेताओं के बीच शक्ति-संतुलन की तस्वीर साफ दिखाई देती है।

आखिरकार श्यामाचरण शुक्ल मुख्यमंत्री बने।

लेकिन चुनाव सामने था।

दूसरी तरफ भाजपा चुपचाप जमीन तैयार कर रही थी

कांग्रेस के भीतर की हलचल के बीच भाजपा का संगठन लगातार काम कर रहा था।

प्रदेश भाजपा के प्रमुख चेहरों में सुंदरलाल पटवा और कैलाश जोशी शामिल थे। पार्टी के संगठन को मजबूत करने में कुशाभाऊ ठाकरे जैसे नेताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी।

1985 में भाजपा को 58 सीटें मिली थीं। लेकिन 1990 तक पार्टी ने प्रदेश के अनेक क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक पकड़ बढ़ा ली थी।

भाजपा के लिए यह सिर्फ चुनाव नहीं था।

यह मौका था यह साबित करने का कि वह कांग्रेस का विपक्ष भर नहीं, बल्कि सत्ता का विकल्प भी बन सकती है।

और इसके लिए उसके पास एक ऐसा नेता था जो प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय था—

सुंदरलाल पटवा।

चुनावी मैदान में आमना-सामना

एक तरफ कांग्रेस के पास श्यामाचरण शुक्ल का मुख्यमंत्री पद का अनुभव था।

दूसरी तरफ भाजपा के पास सुंदरलाल पटवा का संगठनात्मक अनुभव।

लेकिन कांग्रेस के चुनावी अभियान पर अर्जुन सिंह, माधवराव सिंधिया और मोतीलाल वोरा जैसे नेताओं की छाया भी थी।

अर्जुन सिंह खुद चुरहट से चुनाव मैदान में थे।

मध्यप्रदेश की राजनीति में उनकी व्यक्तिगत पकड़ इतनी मजबूत थी कि उनके लिए चुनाव सिर्फ एक विधानसभा सीट का मुकाबला नहीं था। वह कांग्रेस के भीतर अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की लड़ाई भी थी।

उधर भाजपा की नजर पूरे प्रदेश पर थी।

मुद्दे क्या थे?

1990 का चुनाव बाद के वर्षों के चुनावों जैसा नहीं था। आज जिस तरह राम मंदिर आंदोलन या मंडल राजनीति को 1990 की राजनीति के साथ जोड़कर देखा जाता है, उसकी समय-रेखा को ध्यान में रखना जरूरी है।

फरवरी 1990 में चुनाव हो चुका था।

लालकृष्ण आडवाणी की राम रथ यात्रा सितंबर 1990 में शुरू हुई।

मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा भी अगस्त 1990 में हुई।

इसलिए फरवरी के विधानसभा चुनाव को इन बाद की घटनाओं के सीधे प्रभाव वाला चुनाव कहना सही नहीं होगा।

उस समय प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस सरकार का प्रदर्शन, नेतृत्व परिवर्तन, राजनीतिक विवाद, कानून-व्यवस्था, ग्रामीण समस्याएं, किसान और विकास से जुड़े सवाल प्रमुख थे।

और कांग्रेस के खिलाफ विपक्ष का सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार था—

सरकार और संगठन के भीतर दिखाई देने वाली खींचतान।

चुनाव के ठीक पहले एक और घटना

फरवरी 1990 में चुनावी माहौल के बीच कानून-व्यवस्था का सवाल भी उठा।

तत्कालीन सरकार के उपमंत्री गरुड़ मिश्रा ने एक सरपंच की हत्या की घटना के बाद नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दिया।

चुनाव के कुछ ही सप्ताह पहले हुई इस घटना ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का एक और अवसर दिया।

अब कांग्रेस के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं था कि उसने पांच साल में क्या किया।

सवाल यह भी था कि क्या मतदाता सरकार के काम और उसके राजनीतिक संकटों को एक साथ तौलेंगे?

फिर आया 27 फरवरी…

मतदान हुआ।

राजनीतिक गलियारों में दावे चल रहे थे। कांग्रेस अपने पुराने जनाधार के भरोसे थी। भाजपा अपने संगठन और बदलते राजनीतिक माहौल के भरोसे।

लेकिन जब मतपेटियां खुलीं तो तस्वीर ऐसी निकली जिसकी कल्पना 1985 के आंकड़ों को देखकर शायद ही किसी ने की होती।

भाजपा—220 सीटें।

कांग्रेस—56 सीटें।

1985 में 58 सीटों वाली भाजपा पांच साल बाद 220 पर पहुंच चुकी थी।

और 250 सीटों वाली कांग्रेस 56 पर सिमट गई।

मध्यप्रदेश की राजनीति में यह सामान्य सत्ता परिवर्तन नहीं था।

यह एक राजनीतिक भूकंप था।

भाजपा के सामने अब सबसे बड़ा सवाल—मुख्यमंत्री कौन?

बहुमत साफ था।

भाजपा को किसी गठबंधन की जरूरत नहीं थी।

लेकिन पार्टी के अंदर अब दूसरा सवाल खड़ा था—मुख्यमंत्री की कुर्सी किसके पास जाएगी?

सुंदरलाल पटवा सबसे प्रमुख दावेदारों में थे।

लेकिन भाजपा के पास एक और बड़ा नाम था—कैलाश जोशी।

जोशी पहले मुख्यमंत्री रह चुके थे और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते थे।

आखिरकार पार्टी नेतृत्व ने सुंदरलाल पटवा के नाम पर मुहर लगाई।

5 मार्च 1990 को पटवा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

मध्यप्रदेश में पहली बार भाजपा की सरकार बन चुकी थी।

लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं हुई…

चुनाव जीतने के बाद भी भाजपा के अंदर सब कुछ शांत नहीं था।

पटवा के मुख्यमंत्री बनने के बाद कैलाश जोशी की नाराजगी की खबरें सामने आईं। उस समय की रिपोर्टों में पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोष का उल्लेख हुआ।

आखिरकार नवंबर 1990 में कैलाश जोशी पटवा मंत्रिमंडल में शामिल हुए।

यानी जिस पार्टी ने कांग्रेस की गुटबाजी को चुनाव में मुद्दा बनाया था, उसे खुद सत्ता में आने के बाद अपने भीतर के मतभेद संभालने पड़े।

और यह आगे की कहानी का संकेत था।

1990: सिर्फ सरकार बदलने वाला चुनाव नहीं

1990 के मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव की असली कहानी तीन तस्वीरों में दिखाई देती है।

पहली तस्वीर—
1985 की प्रचंड जीत के बाद कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और गुटों का संघर्ष।

दूसरी तस्वीर—
भाजपा का वर्षों तक संगठन खड़ा करना और सत्ता के लिए पहली बड़ी चुनौती देना।

तीसरी तस्वीर—
27 फरवरी के नतीजे, जिन्होंने मध्यप्रदेश की राजनीति का समीकरण बदल दिया।

58 से 220।

250 से 56।

इन दो आंकड़ों के बीच सिर्फ पांच साल का अंतर था।

लेकिन राजनीतिक अर्थों में यह पांच साल मध्यप्रदेश के लिए एक पूरे युग के बदलने का संकेत बन गए।

कांग्रेस के लंबे राजनीतिक प्रभुत्व को पहली बार प्रदेश में भाजपा ने निर्णायक चुनौती देकर सत्ता में बदल दिया था।

सुंदरलाल पटवा मुख्यमंत्री बने और मध्यप्रदेश की राजनीति में भाजपा सरकार का पहला अध्याय शुरू हुआ।

लेकिन शायद उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि यह अध्याय आगे चलकर प्रदेश की राजनीति की सबसे लंबी और महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रतिस्पर्धाओं में बदल जाएगा।

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